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kamada ekadashi fast also gives freedom from the sins of brahma killing know vrat vidhi and katha-Kamada Ekadashi 2022: जानिए कब है कामदा एकादशी, शुभ मुहूर्त, पूजा-विधि, महत्व और सब कुछ

kamada ekadashi fast also gives freedom from the sins of brahma killing know vrat vidhi and katha-Kamada Ekadashi 2022: जानिए कब है कामदा एकादशी, शुभ मुहूर्त, पूजा-विधि, महत्व और सब कुछ

Kamada Ekadashi Vrat Katha, Vidhi: हिंदू धर्म में एकादशी व्रत का खास महत्व होता है। इस दिन लोग व्रत रखते हैं और एकादशी महात्म्य की कथा पढ़कर भगवान विष्णु की आराधना करते हैं। आपको बता दें कि साल में 24 या 25 एकादशी पड़तीं हैं। कामदा एकादशी व्रत चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की एकादशी को कहते हैं। हिन्दू कैलेंडर के मुताबित प्रत्येक माह में दो एकादशी पड़ती है। जिसमें एक शुक्ल पक्ष की एकादशी और दूसरी कृष्ण पक्ष की एकादशी होती है। कामदा एकादशी का वर्णन विष्णु पुराण में किया गया है। जिसके अनुसार जो मनुष्य यह व्रत रखता है, उसे प्रेत योनि से मुक्ति मिल जाती है। साथ ही ब्राह्राण हत्या से भी मुक्ति मिलती है।

जानिए क्या है शुभ मुहूर्त:

इस साल कामदा एकादशी 12 अप्रैल 2022 को है। एकादशी तिथि 12 अप्रैल 2022, मंगलवार को सुबह 04 बजकर 31 मिनट से शुरू होगी, जो कि 13 अप्रैल, बुधवार को सुबह 05 बजकर 03 मिनट पर समाप्त होगी।

इस योग का हो रहा है निर्माण:

कामदा एकादशी पर सर्वार्थ सिद्धि योग का निर्माण हो रहा है। सर्वार्थ सिद्धि योग 12 अप्रैल को सुबह 05 बजकर 59 मिनट से लेकर 13 अप्रैल सुबह 08 बजकर 35 मिनट तक रहेगा। कामदा एकादशी व्रत पारण का समय 13 अप्रैल को दोपहर 01 बजकर 39 मिनट से शाम 04 बजकर 12 मिनट तक रहेगा।

जानिए पूजा- विधि:

  • कामदा एकादशी की सुबह स्नान आदि करने के बाद गंगाजल लेकर व्रत का संकल्प लें।
  • फिर भगवान विष्णु के चित्र की पूजा- अर्चना करें।
  • इसके बाद भगवान विष्णु को फूल, फल, तिल, दूध, पंचामृत आदि चढ़ाना चाहिए।
  • 24 घंटे बिना पानी पिए भगवान विष्णु का स्मरण और भजन-कीर्तन करना चाहिए।
  • कामदा एकादशी व्रत में ब्राह्मण भोजन और दक्षिणा का खास महत्व है। इसलिए ब्राह्मण भोजन के बाद उन्हें दक्षिणा देनी चाहिए।
  • ब्राह्मण भोजन के बाद ही व्रती को भोजन करना चाहिए। ऐसा करने से सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती है।

कामदा एकादशी व्रत कथा: 

विष्णु पुराण के अनुसार प्राचीन काल में भोगीपुर नामक नगर था। वहां पुण्डरीक नामक राजा राज्य करते थे। इस नगर में अनेक अप्सरा, किन्नर और गंधर्व का भी वास था। उनमें से ललिता और ललित के बीचा अत्यंत आपसी स्नेह था। एक दिन गंधर्व ललित दरबार में गान कर रहा था कि अचानक उसे पत्नी ललिता की याद आ गई। इससे उसका स्वर, लय और ताल तीनों बिगड़ने लगे। इस गलती को कर्कट नामक नाग ने जान लिया और यह बात राजा को बता दी। राजा को बड़ा क्रोध आया और ललित को राक्षस होने का श्राप दे दिया।

ललिता को जब यह पता चला तो उसे अत्यंत दुःख हुआ। वह श्रृंगी ऋषि के आश्रम में जाकर प्रार्थना करने लगी। श्रृंगी ऋषि बोले कि हे गंधर्व कन्या! अब चैत्र शुक्ल एकादशी आने वाली है, जिसका नाम ‘कामदा एकादशी’ है। कामदा एकादशी का व्रत कर उसके पुण्य का फल अपने पति को देने से वह राक्षस योनि से मुक्त हो जाएगा। ललिता ने मुनि की आज्ञा का पालन किया और एकादशी व्रत का फल देते ही उसका पति राक्षस योनि से मुक्त होकर अपने पुराने स्वरूप को प्राप्त हुआ।

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